Tuesday, 24 July 2012

क्या मेरी कविताओं में , 

मेरी भी झलक मिलती है ,

शब्दों के इन गाँव में ,

क्या मेरी भी फसल दिखती है ,

क्या सच्चा हूँ में ,

अपनी बातों में ,

क्या मेरी बातों से ,

सच्चाई की परख मिलती है ,

क्या मेरी कविताओं में ,

मेरी भी झलक मिलती है ,

कुछ छोट्टी ,कुछ बड़ी पंक्तियाँ ,

कुछ सीधे ,कुछ टेड़े तर्क ,

चंद जिंदगी से लिए उधारी किस्से ,

कुछ फालतू तेरी मेरी ,

क्या इन सब के सार में ,

मेरी भी गंध मिलती है ,

क्या मेरी कविताओं में ,

मेरी भी झलक मिलती है ,

आंसू बन बहे नहीं जो ,

शब्द बन अब उतरे हैं ,

क्या इन शब्दों में ,

आंसू की नमी मिलती है ,

बड़े संजोये थे सपने ,हमने

बीच फंसे वो 'हा -ना के भंवर में ,

क्या इन 'हा -ना ' ओ ,

में मेरी व्याकुलता दिखती है ,

क्या मेरी कविताओं में ,

मेरी भी झलक मिलती 

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