दिल को भाता है ,
पर हाथ ना आता है ,
अपना सा है ,
पर जाने क्यों शर्माता है ,
ठिठुरती ठण्ड में ,
गरम चाय सा ,
या अनजान शहर ,
में कुछ अपने गाँव सा .
उलझती सुलझती पहेलियों ,
से बहलाता है ,
यहीं कोने पर ही है ,
जाने क्यों नज़र नहीं आता है ,
पूरानी किताब में मिले किसी नोट सा ,
या बचपन में ढूंढे उस बूढ़े बरगद की ओट सा ,
सपनो के धागों से बीने ,
अरमानो के एक रुमाल सा ,
महसूस होता हर शर्ण हर पल ,
बस यूँ ही पास नहीं आता है
पर हाथ ना आता है ,
अपना सा है ,
पर जाने क्यों शर्माता है ,
ठिठुरती ठण्ड में ,
गरम चाय सा ,
या अनजान शहर ,
में कुछ अपने गाँव सा .
उलझती सुलझती पहेलियों ,
से बहलाता है ,
यहीं कोने पर ही है ,
जाने क्यों नज़र नहीं आता है ,
पूरानी किताब में मिले किसी नोट सा ,
या बचपन में ढूंढे उस बूढ़े बरगद की ओट सा ,
सपनो के धागों से बीने ,
अरमानो के एक रुमाल सा ,
महसूस होता हर शर्ण हर पल ,
बस यूँ ही पास नहीं आता है
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